मंगल सगुन सुगम सब ताकें

चौपाई १, दोहा ३०४ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

मंगल सगुन सुगम सब ताकें। सगुन ब्रह्म सुंदर सुत जाकें॥ राम सरिस बरु दुलहिनि सीता। समधी दसरथु जनकु पुनीता॥ १ ॥

अर्थ

स्वयं सगुण ब्रह्म, जिसके सुन्दर पुत्र हैं, उसके लिये सब मंगल-शकुन सुलभ हैं। जहाँ श्रीरामचन्द्रजी-सरीखे दूल्हा और सीताजी-जैसी दुलहिन हैं तथा दशरथजी और जनकजी-जैसे पवित्र समधी हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३०४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।

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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान