हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले
हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले
दोहा ३०५ · बालकाण्ड
दोहा पाठ
हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल। जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ सुबेल॥ ३०५ ॥
अर्थ
[बराती तथा अगवानों में से] कुछ लोग परस्पर मिलने के लिये हर्ष के मारे बाग छोड़कर (सरपट) दौड़ चले, और ऐसे मिले मानो आनन्द के दो समुद्र मर्यादा छोड़कर मिलते हों।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का दोहा ३०५ है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।
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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान