सुनि बोले गुर अति सुखु पाई
सुनि बोले गुर अति सुखु पाई
चौपाई १, दोहा २९४ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनि बोले गुर अति सुखु पाई। पुन्य पुरुष कहुँ महि सुख छाई॥ जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं। जद्यपि ताहि कामना नाहीं॥ १ ॥
अर्थ
सब समाचार सुनकर और अत्यन्त सुख पाकर गुरु बोले--पुण्यात्मा पुरुष के लिये पृथ्वी सुखों से छायी हुई है। जैसे नदियाँ समुद्र में जाती हैं, यद्यपि समुद्र को नदी की कामना नहीं होती।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २९४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।
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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान