हरषि चले निज निज गृह आए
हरषि चले निज निज गृह आए
चौपाई ३, दोहा २८७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
हरषि चले निज निज गृह आए। पुनि परिचारक बोलि पठाए॥ रचहु बिचित्र बितान बनाई। सिर धरि बचन चले सचु पाई॥ ३ ॥
अर्थ
महाजन प्रसन्न होकर चले और अपने-अपने घर आये। फिर राजा ने नौकरों को बुला भेजा [और उन्हें आज्ञा दी कि] विचित्र मण्डप सजाकर तैयार करो। यह सुनकर वे सब राजा के वचन सिर पर धरकर और सुख पाकर चले।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २८७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।
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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान