कनक कलस भरि कोपर थारा
कनक कलस भरि कोपर थारा
चौपाई १, दोहा ३०५ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
कनक कलस भरि कोपर थारा। भाजन ललित अनेक प्रकारा॥ भरे सुधासम सब पकवाने। नाना भाँति न जाहिं बखाने॥ १ ॥
अर्थ
[दूध, शर्बत, ठंडाई, जल आदि से] भरे हुए सोने के कलश तथा परात, थाल आदि अनेक प्रकार के सुन्दर बर्तन; भरे हुए अमृत के समान सब पकवान, जिनका नाना प्रकार से वर्णन नहीं किया जा सकता।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३०५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।
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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान