करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही
करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही
चौपाई २, दोहा २९० के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही। मुदित महीप आपु उठि लीन्ही॥ बारि बिलोचन बाँचत पाती। पुलक गात आई भरि छाती॥ २ ॥
अर्थ
दूतों ने प्रणाम करके चिट्ठी दी। प्रसन्न होकर राजा ने स्वयं उठकर उसे लिया। चिट्ठी बाँचते समय उनके नेत्रों में जल भर आया, शरीर पुलकित हो गया और छाती भर आयी।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २९० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।
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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान