सुभग सकल सुठि चंचल करनी

चौपाई ३, दोहा २९८ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

सुभग सकल सुठि चंचल करनी। अय इव जरत धरत पग धरनी॥ नाना जाति न जाहिं बखाने। निदरि पवनु जनु चहत उड़ाने॥ ३ ॥

अर्थ

सब घोड़े बड़े ही सुन्दर और चञ्चल करनी (चाल) के हैं। वे धरती पर ऐसे पैर रखते हैं जैसे जलते हुए लोहे पर रखते हों। अनेकों जाति के घोड़े हैं, जिनका वर्णन नहीं हो सकता। [ ऐसी तेज चाल के हैं] मानो हवा का निरादर करके उड़ना चाहते हों।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २९८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।

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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान