भरत सकल साहनी बोलाए
भरत सकल साहनी बोलाए
चौपाई २, दोहा २९८ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
भरत सकल साहनी बोलाए। आयसु दीन्ह मुदित उठि धाए॥ रचि रुचि जीन तुरग तिन्ह साजे। बरन बरन बर बाजि बिराजे॥ २ ॥
अर्थ
भरतजी ने सब साहनी (घुड़साल के अध्यक्ष) बुलाये और उन्हें [घोड़ों को सजाने की ] आज्ञा दी, वे प्रसन्न होकर उठ दौड़े। उन्होंने रुचि के साथ (यथायोग्य) जीनें कसकर घोड़े सजाये। रंग-रंग के उत्तम घोड़े शोभित हो गये।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २९८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।
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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान