जहँ तहँ जूथ जूथ मिलि भामिनि
जहँ तहँ जूथ जूथ मिलि भामिनि
चौपाई १, दोहा २९७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जहँ तहँ जूथ जूथ मिलि भामिनि। सजि नवसप्त सकल दुति दामिनि॥ बिधुबदनीं मृग सावक लोचनि। निज सरूप रति मानु बिमोचनि॥ १ ॥
अर्थ
बिजली की-सी कान्तिवाली, चन्द्रमुखी, हरिण के बच्चे के-से नेत्रवाली और अपने सुन्दर रूप से कामदेव की स्त्री रति के अभिमान को छुड़ानेवाली सुहागिनी स्त्रियाँ सभी सोलहों श्रृंगार सजकर, जहाँ-तहाँ झुंड-की-झुंड मिलकर,।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २९७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।
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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान