दूलहु रामु रूप गुन सागर

चौपाई ३, दोहा २८९ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

दूलहु रामु रूप गुन सागर। सो बितानु तिहुँ लोक उजागर॥ जनक भवन कै सोभा जैसी। गृह गृह प्रति पुर देखिअ तैसी॥ ३ ॥

अर्थ

जिस मण्डप में रूप और गुणों के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी दूल्हे होंगे, वह मण्डप तीनों लोकों में प्रसिद्ध होना ही चाहिए। जनकजी के महल की जैसी शोभा है, वैसी ही शोभा नगर के प्रत्येक घर की दिखाई देती है।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २८९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।

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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान