तिन्ह कहँ कहिअ नाथ किमि चीन्हे
तिन्ह कहँ कहिअ नाथ किमि चीन्हे
चौपाई २, दोहा २९२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
तिन्ह कहँ कहिअ नाथ किमि चीन्हे। देखिअ रबि कि दीप कर लीन्हे॥ सीय स्वयंबर भूप अनेका। समिटे सुभट एक तें एका॥ २ ॥
अर्थ
हे नाथ! उनके लिये आप कहते हैं कि उन्हें कैसे पहचाना! क्या सूर्य को हाथ में दीपक लेकर देखा जाता है? सीताजी के स्वयंवर में अनेक राजा और एक-से-एक बढ़कर योद्धा एकत्र हुए थे।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २९२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।
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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान