गावहिं मंगल मंजुल बानीं

चौपाई २, दोहा २९७ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

गावहिं मंगल मंजुल बानीं। सुनि कलरव कलकंठि लजानीं॥ भूप भवन किमि जाइ बखाना। बिस्व बिमोहन रचेउ बिताना॥ २ ॥

अर्थ

मनोहर वाणी से मङ्गल गीत गा रही हैं, जिनके सुन्दर स्वर को सुनकर कोयलें भी लजा जाती हैं। राजमहल का वर्णन कैसे किया जाय, जहाँ विश्व को विमोहित करनेवाला मण्डप बनाया गया है।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २९७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
जनक का दूत, बारात का प्रस्थान