मंडपु बिलोकि बिचित्र रचनाँ रुचिरताँ मुनि
मंडपु बिलोकि बिचित्र रचनाँ रुचिरताँ मुनि
छन्द, दोहा ३२० के अंतर्गत · बालकाण्ड
छन्द पाठ
मंडपु बिलोकि बिचित्र रचनाँ रुचिरताँ मुनि मन हरे। निज पानि जनक सुजान सब कहुँ आनि सिंघासन धरे॥ कुल इष्ट सरिस बसिष्ट पूजे बिनय करि आसिष लही। कौसिकहि पूजत परम प्रीति कि रीति तौ न परै कही॥
अर्थ
मण्डप को देखकर उसकी विचित्र रचना और सुन्दरता से मुनियों के मन भी हरे गये। सुजान जनकजी ने अपने हाथों से ला-लाकर सबके लिये सिंहासन रखे। उन्होंने अपने कुल के इष्टदेव के समान वसिष्ठजी की पूजा की और विनय करके आशीर्वाद प्राप्त किया। विश्वामित्रजी की पूजा करते समय की परम प्रीति की रीति तो कहते ही नहीं बनती॥
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का छन्द, दोहा ३२० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।
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बारात का जनकपुर में स्वागत