आचारु करि गुर गौरि गनपति मुदित

छन्द १, दोहा ३२३ के अंतर्गत · बालकाण्ड

छन्द पाठ

आचारु करि गुर गौरि गनपति मुदित बिप्र पुजावहीं। सुर प्रगटि पूजा लेहिं देहिं असीस अति सुखु पावहीं॥ मधुपर्क मंगल द्रब्य जो जेहि समय मुनि मन महुँ चहैं। भरे कनक कोपर कलस सो तब लिएहिं परिचारक रहैं॥ १ ॥

अर्थ

आचार करके गुरु, गौरी, गणपति और ब्राह्मणों की पूजा मुदित होकर कराई जाती है। देव प्रकट होकर पूजा लेते हैं, आशीष देते हैं और अति सुख पाते हैं। मधुपर्क और मंगल द्रव्य जो जिस समय मुनि मन में चाहें, भरे हुए सोने के कोपर और कलश तब परिचारक ले आते हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का छन्द १, दोहा ३२३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।

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बारात का जनकपुर में स्वागत