को जान केहि आनंद बस सब
को जान केहि आनंद बस सब
छन्द, दोहा ३१८ के अंतर्गत · बालकाण्ड
छन्द पाठ
को जान केहि आनंद बस सब ब्रह्मु बर परिछन चली। कल गान मधुर निसान बरषहिं सुमन सुर सोभा भली॥ आनंदकंदु बिलोकि दूलहु सकल हियँ हरषित भई। अंभोज अंबक अंबु उमगि सुअंग पुलकावलि छई॥
अर्थ
कौन किसे जाने! आनन्द के वश हुई सब ब्रह्म वर परछन करने चलीं। मनोहर गान हो रहा है। मधुर नगाड़े बज रहे हैं, देवता फूल बरसा रहे हैं, बड़ी अच्छी शोभा है। आनन्दकन्द दूलह को देखकर सब स्त्रियाँ हृदय में हर्षित हुईं। उनके कमल-सरीखे नेत्रों में प्रेमाश्रुओं का जल उमड़ आया और सुन्दर अंगों में पुलकावली छा गयी॥
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का छन्द, दोहा ३१८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।
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बारात का जनकपुर में स्वागत