कहहिं परस्पर नारि बारि बिलोचन पुलक

सोरठा ३११ · बालकाण्ड

सोरठा पाठ

कहहिं परस्पर नारि बारि बिलोचन पुलक तन। सखि सबु करब पुरारि पुन्य पयोनिधि भूप दोउ॥ ३११ ॥

अर्थ

नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भरकर, पुलकित शरीर से स्त्रियाँ आपस में कह रही हैं कि हे सखी! दोनों राजा पुण्य के समुद्र हैं, त्रिपुरारि शिवजी सब मनोरथ पूर्ण करेंगे।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का सोरठा ३११ है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
बारात का जनकपुर में स्वागत