सजि आरती अनेक बिधि मंगल सकल
सजि आरती अनेक बिधि मंगल सकल
दोहा ३१७ · बालकाण्ड
दोहा पाठ
सजि आरती अनेक बिधि मंगल सकल सँवारि। चलीं मुदित परिछनि करन गजगामिनि बर नारि॥ ३१७ ॥
अर्थ
अनेक प्रकार से आरती सजाकर और समस्त मंगल साजकर गजगामिनी (हाथी की-सी चाल वाली) उत्तम स्त्रियाँ आनन्दपूर्वक परछन के लिये चलीं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का दोहा ३१७ है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।
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बारात का जनकपुर में स्वागत