जो सुखु भा सिय मातु मन

दोहा ३१८ · बालकाण्ड

दोहा पाठ

जो सुखु भा सिय मातु मन देखि राम बर बेषु। सो न सकहिं कहि कलप सत सहस सारदा सेषु॥ ३१८ ॥

अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी का वरवेष देखकर सीताजी की माता सुनयनाजी के मन में जो सुख हुआ, उसे हजारों सरस्वती और शेषजी सौ कल्पों में भी नहीं कह सकते [अथवा लाखों सरस्वती और शेष लाखों कल्पों में भी नहीं कह सकते]।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का दोहा ३१८ है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।

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बारात का जनकपुर में स्वागत