जेहि तुरंग पर रामु बिराजे
जेहि तुरंग पर रामु बिराजे
चौपाई ४, दोहा ३१६ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जेहि तुरंग पर रामु बिराजे। गति बिलोकि खगनायकु लाजे॥ कहि न जाइ सब भाँति सुहावा। बाजि बेषु जनु काम बनावा॥ ४ ॥
अर्थ
जिस घोड़े पर श्रीरामजी विराजमान हैं, उसकी गति देखकर गरुड़ भी लजा जाते हैं। उसका वर्णन नहीं हो सकता, वह सब प्रकार से सुन्दर है। मानो कामदेव ने ही घोड़े का वेष धारण कर लिया हो।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३१६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।
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बारात का जनकपुर में स्वागत