मरकत कनक बरन बर जोरी
मरकत कनक बरन बर जोरी
चौपाई ४, दोहा ३१५ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
मरकत कनक बरन बर जोरी। देखि सुरन्ह भै प्रीति न थोरी॥ पुनि रामहि बिलोकि हियँ हरषे। नृपहि सराहि सुमन तिन्ह बरषे॥ ४ ॥
अर्थ
मरकत मणि और सुवर्ण के रंग की सुन्दर जोड़ियों को देखकर देवताओं को कम प्रीति नहीं हुई (अर्थात् बहुत ही प्रीति हुई)। फिर श्रीरामचन्द्रजी को देखकर वे हृदय में अत्यन्त हर्षित हुए और राजा की सराहना करके उन्होंने फूल बरसाये।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३१५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।
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बारात का जनकपुर में स्वागत