जनक सुकृत मूरति बैदेही
जनक सुकृत मूरति बैदेही
चौपाई १, दोहा ३१० के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जनक सुकृत मूरति बैदेही। दसरथ सुकृत रामु धरें देही॥ इन्ह सम काहुँ न सिव अवराधे। काहुँ न इन्ह समान फल लाधे॥ १ ॥
अर्थ
जनकजी के सुकृत (पुण्य) की मूर्ति जानकीजी हैं और दशरथजी के सुकृत देह धारण किये हुए श्रीरामजी हैं। इन [दोनों राजाओं] के समान किसी ने शिवजी की आराधना नहीं की; और न इनके समान किसी ने फल ही पाया।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३१० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
बारात का जनकपुर में स्वागत