कहा एक मैं आजु निहारे
कहा एक मैं आजु निहारे
चौपाई ३, दोहा ३११ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
कहा एक मैं आजु निहारे। जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे॥ भरतु रामही की अनुहारी। सहसा लखि न सकहिं नर नारी॥ ३ ॥
अर्थ
एक ने कहा—मैंने आज ही उन्हें देखा है; इतने सुन्दर हैं, मानो ब्रह्माजी ने उन्हें अपने हाथ सँवारा है। भरत तो श्रीरामचन्द्रजी की ही शक्ल-सूरत के हैं। स्त्री-पुरुष उन्हें सहसा पहचान नहीं सकते।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।
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बारात का जनकपुर में स्वागत