बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि
बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि
चौपाई १, दोहा ३१८ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि। सब निज तन छबि रति मदु मोचनि॥ पहिरें बरन बरन बर चीरा। सकल बिभूषन सजें सरीरा॥ १ ॥
अर्थ
सभी स्त्रियाँ चन्द्रमुखी (चन्द्रमा के समान मुखवाली) और सभी मृगलोचनी (हरिण की-सी आँखोंवाली) हैं और सभी अपने शरीर की शोभा से रति के मद को छुड़ानेवाली हैं। रंग-रंग की सुन्दर साड़ियाँ पहने हैं और शरीर पर सब आभूषण सजे हुए हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३१८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।
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बारात का जनकपुर में स्वागत