पुनि दंडवत करत दोउ भाई
पुनि दंडवत करत दोउ भाई
चौपाई २, दोहा ३०८ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
पुनि दंडवत करत दोउ भाई। देखि नृपति उर सुखु न समाई॥ सुत हियँ लाइ दुसह दुख मेटे। मृतक सरीर प्रान जनु भेंटे॥ २ ॥
अर्थ
फिर दोनों भाइयों को दण्डवत् प्रणाम करते देखकर राजा के हृदय में सुख समाया नहीं। पुत्रों को [उठाकर] हृदय से लगाकर उन्होंने अपने [वियोगजनित] दुःसह दुःख को मिटाया। मानो मृतक शरीर को प्राण मिल गये हों।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३०८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।
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बारात का जनकपुर में स्वागत