प्रेम पुलक तन हृदयँ उछाहू
प्रेम पुलक तन हृदयँ उछाहू
चौपाई २, दोहा ३१४ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
प्रेम पुलक तन हृदयँ उछाहू। चले बिलोकन राम बिआहू॥ देखि जनकपुरु सुर अनुरागे। निज निज लोक सबहिं लघु लागे॥ २ ॥
अर्थ
और प्रेम से पुलकित-शरीर हो तथा हृदय में उत्साह भरकर श्रीरामचन्द्रजी का विवाह देखने चले। जनकपुर को देखकर देवता इतने अनुरक्त हो गये कि उन सबको अपने-अपने लोक बहुत तुच्छ लगने लगे।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३१४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
बारात का जनकपुर में स्वागत