सकल सुमंगल अंग बनाएँ

चौपाई २, दोहा ३१८ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

सकल सुमंगल अंग बनाएँ। करहिं गान कलकंठि लजाएँ॥ कंकन किंकिनि नूपुर बाजहिं। चालि बिलोकि काम गज लाजहिं॥ २ ॥

अर्थ

समस्त अंगों को सुन्दर मंगल पदार्थों से सजाये हुए वे कोयल को भी लजाती हुईं [मधुर स्वर से] गान कर रही हैं। कंगन, किंकिनी और नूपुर बज रहे हैं। स्त्रियों की चाल देखकर कामदेव के हाथी भी लजा जाते हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३१८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।

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बारात का जनकपुर में स्वागत