पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए
पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए
चौपाई ३, दोहा ३०८ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए। प्रेम मुदित मुनिबर उर लाए॥ बिप्र बृंद बंदे दुहुँ भाईं। मनभावती असीसें पाईं॥ ३ ॥
अर्थ
फिर उन्होंने वसिष्ठजी के चरणों में सिर नवाया। मुनिश्रेष्ठ ने प्रेम के आनन्द में उन्हें हृदय से लगा लिया। दोनों भाइयों ने सब ब्राह्मणों की वन्दना की और मनभाये आशीर्वाद पाये।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३०८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।
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बारात का जनकपुर में स्वागत