बहुरि कीन्हि कोसलपति पूजा

चौपाई १, दोहा ३२१ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

बहुरि कीन्हि कोसलपति पूजा। जानि ईस सम भाउ न दूजा॥ कीन्हि जोरि कर बिनय बड़ाई। कहि निज भाग्य बिभव बहुताई॥ १ ॥

अर्थ

फिर उन्होंने कोसलाधीश राजा दशरथजी की पूजा, उन्हें ईश (महादेवजी) के समान जानकर, की; दूसरा भाव न था। तदनन्तर अपने भाग्य और वैभव की बहुताई कहकर हाथ जोड़कर विनय और बड़ाई की।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३२१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।

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बारात का जनकपुर में स्वागत