बार बार सनमानहिं रानी
बार बार सनमानहिं रानी
चौपाई ४, दोहा ३२२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
बार बार सनमानहिं रानी। उमा रमा सारद सम जानी॥ सीय सँवारि समाजु बनाई। मुदित मंडपहिं चलीं लवाई॥ ४ ॥
अर्थ
उन्हें उमा, रमा और सरस्वती के समान जानकर रानी बार-बार उनका सम्मान करती हैं। सीताजी को सँवारकर समाज बनाया और प्रसन्न होकर उन्हें मण्डप में लिवा चलीं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३२२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।
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बारात का जनकपुर में स्वागत