चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि
चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि
छन्द, दोहा ३२२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
छन्द पाठ
चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं। नवसप्त साजे सुंदरीं सब मत्त कुंजर गामिनीं॥ कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं। मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गति बर बाजहीं॥
अर्थ
सुन्दर मंगल वेश में सखियाँ सादर सीताजी को लिवा लाईं। सभी सुन्दरियाँ नवसप्त साजे हुए, मदमत्त हाथियों की चाल से चलने वाली हैं। मधुर गान सुनकर मुनि ध्यान त्याग देते हैं; काम की कोकिलाएँ लजाती हैं। मंजीर, नूपुर, कलित कंकण ताल-गति पर बड़े सुन्दर बजते हैं॥
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का छन्द, दोहा ३२२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।
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बारात का जनकपुर में स्वागत