कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि

छन्द २, दोहा ३२३ के अंतर्गत · बालकाण्ड

छन्द पाठ

कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि देत सबु सादर कियो। एहि भाँति देव पुजाइ सीतहि सुभग सिंघासनु दियो॥ सिय राम अवलोकनि परसपर प्रेमु काहु न लखि परै। मन बुद्धि बर बानी अगोचर प्रगट कबि कैसें करै॥ २ ॥

अर्थ

कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि देत सबु सादर कियो। इस भाँति देव पुजाइ सीतहि सुभग सिंघासनु दियो। सिय राम अवलोकनि परस्पर प्रेमु काहु न लखि परै। मन बुद्धि बर बानी अगोचर प्रगट कबि कैसे करै॥

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का छन्द २, दोहा ३२३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।

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बारात का जनकपुर में स्वागत