सुर सेनप उर बहुत उछाहू

चौपाई ३, दोहा ३१७ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

सुर सेनप उर बहुत उछाहू। बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू॥ रामहि चितव सुरेस सुजाना। गौतम श्रापु परम हित माना॥ ३ ॥

अर्थ

देवताओं के सेनापति कार्तिकेय के हृदय में बड़ा उत्साह है, क्योंकि वे ब्रह्माजी से डेढ़ अर्थात् बारह नेत्रों से रामदर्शन का सुन्दर लाभ उठा रहे हैं। सुजान इन्द्र [अपने हजार नेत्रों से] श्रीरामचन्द्रजी को देख रहे हैं और गौतमजी के शाप को अपने लिए परम हितकर मान रहे हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३१७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।

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बारात का जनकपुर में स्वागत