सुर प्रनामु करि बरिसहिं फूला
सुर प्रनामु करि बरिसहिं फूला
चौपाई ३, दोहा ३२३ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सुर प्रनामु करि बरिसहिं फूला। मुनि असीस धुनि मंगल मूला॥ गान निसान कोलाहलु भारी। प्रेम प्रमोद मगन नर नारी॥ ३ ॥
अर्थ
देवता प्रणाम करके फूल बरसा रहे हैं। मुनियों की आशीष-ध्वनि मंगलमूल हो रही है। गान और निसान के कोलाहल से भारी शोर है। नर-नारी प्रेम और प्रमोद में मग्न हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३२३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।
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बारात का जनकपुर में स्वागत