तिन्हहि देखि सब सुर सुरनारीं

चौपाई ४, दोहा ३१४ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

तिन्हहि देखि सब सुर सुरनारीं। भए नखत जनु बिधु उजिआरीं॥ बिधिहि भयउ आचरजु बिसेषी। निज करनी कछु कतहुँ न देखी॥ ४ ॥

अर्थ

उन्हें देखकर सब देवता और सुरनारियाँ ऐसे हो गये जैसे चन्द्रमा के उजियाले में तारे फीके पड़ जाते हैं। ब्रह्माजी को विशेष आश्चर्य हुआ; क्योंकि वहाँ उन्होंने अपनी कोई करनी (रचना) कहीं देखी ही नहीं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३१४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।

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बारात का जनकपुर में स्वागत