केकि कंठ दुति स्यामल अंगा

चौपाई १, दोहा ३१६ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

केकि कंठ दुति स्यामल अंगा। तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा॥ ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए। मंगल सब सब भाँति सुहाए॥ १ ॥

अर्थ

रामजी का मोर के कण्ठ-सी कान्तिवाला श्यामल अंग है। बिजली का अत्यन्त निरादर करनेवाले प्रकाशमय सुन्दर रंग के वस्त्र हैं। विवाह के विविध आभूषण बनाए गए हैं, जो सब प्रकार से मंगलकारी और सुहावने हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३१६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।

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बारात का जनकपुर में स्वागत