मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा
मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा
चौपाई १, दोहा ३०८ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा। बार बार पद रज धरि सीसा॥ कौसिक राउ लिए उर लाई। कहि असीस पूछी कुसलाई॥ १ ॥
अर्थ
पृथ्वीपति दशरथजी ने मुनि की चरणधूलि को बार-बार सिर पर चढ़ाकर उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। विश्वामित्रजी ने राजा को उठाकर हृदय से लगा लिया और आशीर्वाद देकर कुशल पूछी।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३०८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।
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बारात का जनकपुर में स्वागत