बिबिध भाँति होइहि पहुनाई
बिबिध भाँति होइहि पहुनाई
चौपाई १, दोहा ३११ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
बिबिध भाँति होइहि पहुनाई। प्रिय न काहि अस सासुर माई॥ तब तब राम लखनहि निहारी। होइहहिं सब पुर लोग सुखारी॥ १ ॥
अर्थ
तब उनकी अनेकों प्रकार से पहुनाई होगी। सखी! ऐसी ससुराल किसे प्यारी न होगी! तब-तब हम सब नगर निवासी श्रीराम-लक्ष्मण को देख-देखकर सुखी होंगे।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का जनकपुर में स्वागत” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या की बारात का जनकपुर में हर्षपूर्ण स्वागत और मंगल आयोजन का वर्णन है।
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बारात का जनकपुर में स्वागत