विश्वमोहिनी का स्वयंवर, शिवगणों को तथा भगवान को शाप और नारद का मोहभंग
विश्वमोहिनी के स्वयंवर में नारदजी मोहवश अपमान अनुभव करते हैं और क्रोध में शिवगणों तथा स्वयं भगवान को शाप दे बैठते हैं। अंततः उनकी माया दूर होती है और वे लीला का रहस्य समझकर विनम्र हो जाते हैं।
बालकाण्ड · प्रकरण ३१ / ५९
प्रकरण पाठ
बसहिं नगर सुंदर नर नारी। जनु बहु मनसिज रति तनुधारी॥ तेहिं पुर बसइ सीलनिधि राजा। अगनित हय गय सेन समाजा॥ १ ॥
अर्थ:
उस नगर में ऐसे सुन्दर नर-नारी बसते थे मानो बहुत-से कामदेव और [उसकी स्त्री] रति ही मनुष्य-शरीर धारण किये हुए हों। उस नगर में शीलनिधि नाम का राजा रहता था, जिसके यहाँ असंख्य घोड़े, हाथी और सेना के समूह (टुकड़ियाँ) थे।
देखि रूप मुनि बिरति बिसारी। बड़ी बार लगि रहे निहारी॥ लच्छन तासु बिलोकि भुलाने। हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने॥ १ ॥
अर्थ:
उसके रूप को देखकर मुनि वैराग्य भूल गये और बड़ी देर तक उसकी ओर देखते ही रह गये। उसके लक्षण देखकर मुनि अपने-आप को भी भूल गये और हृदय में हर्षित हुए, पर प्रकट रूप में उन लक्षणों को नहीं कहा।
बहुबिधि बिनय कीन्हि तेहि काला। प्रगटेउ प्रभु कौतुकी कृपाला॥ प्रभु बिलोकि मुनि नयन जुड़ाने। होइहि काजु हिएँ हरषाने॥ २ ॥
अर्थ:
उस समय नारदजी ने भगवान् की बहुत प्रकार से विनती की। तब लीलामय कृपालु प्रभु [वहीं] प्रकट हो गये। स्वामी को देखकर नारदजी के नेत्र शीतल हो गये और वे मन में बड़े ही हर्षित हुए कि अब तो काम बन ही जाएगा।
अति आरति कहि कथा सुनाई। करहु कृपा करि होहु सहाई॥ आपन रूप देहु प्रभु मोही। आन भाँति नहिं पावौं ओही॥ ३ ॥
अर्थ:
नारदजी ने बहुत आर्त (दीन) होकर सब कथा कह सुनायी [और प्रार्थना की कि] कृपा कीजिये और कृपा करके मेरे सहायक बनिये। हे प्रभो! आप अपना रूप मुझको दीजिये और किसी प्रकार मैं उस (राजकन्या) को नहीं पा सकता।
मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ। हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ॥ जदपि सुनहिं मुनि अटपटि बानी। समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी॥ ३ ॥
अर्थ:
नारद मुनि को मोह हो रहा था, क्योंकि उनका मन दूसरे के हाथ में था। शिवजी के गण बहुत प्रसन्न होकर हँस रहे थे। यद्यपि मुनि उनकी अटपटी बातें सुन रहे थे, पर बुद्धि भ्रम में सनी हुई होने के कारण वे बातें उनकी समझ में नहीं आती थीं (उनकी बातों को वे अपनी प्रशंसा समझ रहे थे)।
मुनि अति बिकल मोहँ मति नाठी। मनि गिरि गई छूटि जनु गाँठी॥ तब हर गन बोले मुसुकाई। निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई॥ ३ ॥
अर्थ:
मोह के कारण मुनि की बुद्धि नष्ट हो गयी थी, इससे वे [राजकुमारी को देख] बहुत ही विकल हो गये। मानो गाँठ से छूटकर मणि गिर गयी हो। तब शिवजी के गणों ने मुसकराकर कहा-- जाकर दर्पण में अपना मुँह तो देखिये!
देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई। जगत मोरि उपहास कराई॥ बीचहिं पंथ मिले दनुजारी। संग रमा सोइ राजकुमारी॥ २ ॥
अर्थ:
[मन में सोचते जाते थे--] जाकर या तो शाप दूँगा या प्राण दे दूँगा। उन्होंने जगत् में मेरी हँसी करायी। दैत्यों के शत्रु भगवान् हरि उन्हें बीच रास्ते में ही मिल गये। साथ में लक्ष्मीजी और वही राजकुमारी थीं।
भले भवन अब बायन दीन्हा। पावहुगे फल आपन कीन्हा॥ बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा। सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा॥ ३ ॥
अर्थ:
अबकी तुमने अच्छे घर बैना दिया है (मेरे-जैसे जबर्दस्त आदमी से छेड़खानी की है)। अतः अपने किये का फल अवश्य पाओगे। जिस शरीर को धारण करके तुमने मुझे ठगा है, तुम भी वही शरीर धारण करो, यह मेरा शाप है।
कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी॥ मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी। नारि बिरहँ तुम्ह होब दुखारी॥ ४ ॥
अर्थ:
तुमने हमारा रूप बन्दर-सा बना दिया था, इससे बन्दर ही तुम्हारी सहायता करेंगे। [मैं जिस स्त्री को चाहता था, उससे मेरा वियोग कराकर] तुमने मेरा बड़ा अहित किया है, इससे तुम भी स्त्री के वियोग में दुःखी होगे।
जब हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी॥ तब मुनि अति सभीत हरि चरना। गहे पाहि प्रनतारति हरना॥ १ ॥
अर्थ:
जब भगवान्ने अपनी माया को हटा लिया, तब वहाँ न लक्ष्मी ही रह गयीं, न राजकुमारी ही। तब मुनि ने अत्यन्त भयभीत होकर श्रीहरि के चरण पकड़ लिये और कहा--हे शरणागत के दुःखों को हरनेवाले! मेरी रक्षा कीजिये।
मृषा होउ मम श्राप कृपाला। मम इच्छा कह दीनदयाला॥ मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे। कह मुनि पाप मिटिहिं किमि मेरे॥ २ ॥
अर्थ:
हे कृपालु ! मेरा शाप मिथ्या हो जाय। तब दीनों पर दया करने वाले भगवान् ने कहा कि यह सब मेरी ही इच्छा [से हुआ] है। मुनि ने कहा-मैंने आपको अनेक खोटे वचन कहे हैं। मेरे पाप कैसे मिटेंगे ?
हरि अनंत हरिकथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥ रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥ ३ ॥
अर्थ:
श्रीहरि अनन्त हैं (उनका कोई पार नहीं पा सकता) और उनकी कथा भी अनन्त है; सब संत लोग उसे बहुत प्रकार से कहते-सुनते हैं। श्रीरामचन्द्रजी के सुन्दर चरित्र करोड़ कल्पों में भी गाये नहीं जा सकते।
यह प्रसंग मैं कहा भवानी। हरिमायाँ मोहहिं मुनि ग्यानी॥ प्रभु कौतुकी प्रनत हितकारी। सेवत सुलभ सकल दुखहारी॥ ४ ॥
अर्थ:
[शिवजी कहते हैं कि] हे पार्वती! मैंने यह बतलाने के लिये इस प्रसंग को कहा कि ज्ञानी मुनि भी भगवान् की माया से मोहित हो जाते हैं। प्रभु कौतुकी (लीलामय) हैं और शरणागत का हित करनेवाले हैं। वे सेवा करने में बहुत सुलभ और सब दुःखों के हरनेवाले हैं।
अपर हेतु सुनु सैलकुमारी। कहउँ बिचित्र कथा बिस्तारी॥ जेहि कारन अज अगुन अरूपा। ब्रह्म भयउ कोसलपुर भूपा॥ १ ॥
अर्थ:
हे गिरिराजकुमारी! अब भगवान् के अवतार का वह दूसरा कारण सुनो—मैं उसकी विचित्र कथा विस्तार करके कहता हूँ—जिस कारण से जन्मरहित, निर्गुण और रूपरहित (अव्यक्त सच्चिदानन्दघन) ब्रह्म अयोध्यापुरी के राजा हुए।
अजहुँ न छाया मिटति तुम्हारी। तासु चरित सुनु भ्रम रुज हारी॥ लीला कीन्हि जो तेहिं अवतारा। सो सब कहिहउँ मति अनुसारा॥ ३ ॥
अर्थ:
अब भी तुम्हारे उस बावलेपन की छाया नहीं मिटती, उन्हीं के भ्रमरूपी रोग के हरण करनेवाले चरित्र सुनो। उस अवतार में भगवान् ने जो-जो लीला की, वह सब मैं अपनी बुद्धि के अनुसार तुम्हें कहूँगा।