विश्वमोहिनी का स्वयंवर, शिवगणों को तथा भगवान को शाप और नारद का मोहभंग

विश्वमोहिनी के स्वयंवर में नारदजी मोहवश अपमान अनुभव करते हैं और क्रोध में शिवगणों तथा स्वयं भगवान को शाप दे बैठते हैं। अंततः उनकी माया दूर होती है और वे लीला का रहस्य समझकर विनम्र हो जाते हैं।

बालकाण्ड · प्रकरण ३१ / ५९

प्रकरण पाठ

दोहा

बिरचेउ मग महुँ नगर तेहिं सत जोजन बिस्तार। श्रीनिवासपुर तें अधिक रचना बिबिध प्रकार॥ १२९ ॥

अर्थ:

उस (हरिमाया) ने रास्ते में सौ योजन का एक नगर रचा। उस नगर की भाँति-भाँतिकी रचनाएँ लक्ष्मीनिवास भगवान् विष्णु के नगर (वैकुण्ठ) से भी अधिक सुन्दर थीं।

दोहा 130 के अंतर्गत
चौपाई

बसहिं नगर सुंदर नर नारी। जनु बहु मनसिज रति तनुधारी॥ तेहिं पुर बसइ सीलनिधि राजा। अगनित हय गय सेन समाजा॥ १ ॥

अर्थ:

उस नगर में ऐसे सुन्दर नर-नारी बसते थे मानो बहुत-से कामदेव और [उसकी स्त्री] रति ही मनुष्य-शरीर धारण किये हुए हों। उस नगर में शीलनिधि नाम का राजा रहता था, जिसके यहाँ असंख्य घोड़े, हाथी और सेना के समूह (टुकड़ियाँ) थे।

चौपाई

सत सुरेस सम बिभव बिलासा। रूप तेज बल नीति निवासा॥ बिस्वमोहनी तासु कुमारी। श्री बिमोह जिसु रूपु निहारी॥ २ ॥

अर्थ:

उसका वैभव और विलास सौ इन्द्रों के समान था। वह रूप, तेज, बल और नीति का घर था। उसके विश्वमोहिनी नाम की एक [ऐसी रूपवती] कन्या थी, जिसके रूप को देखकर लक्ष्मीजी भी मोहित हो जायँ।

चौपाई

सोइ हरिमाया सब गुन खानी। सोभा तासु कि जाइ बखानी॥ करइ स्वयंबर सो नृपबाला। आए तहँ अगनित महिपाला॥ ३ ॥

अर्थ:

वह सब गुणों की खान भगवान् की माया ही थी। उसकी शोभा का वर्णन कैसे किया जा सकता है। वह राजकुमारी स्वयंवर करना चाहती थी, इससे वहाँ अगणित राजा आये हुए थे।

चौपाई

मुनि कौतुकी नगर तेहिं गयऊ। पुरबासिन्ह सब पूछत भयऊ॥ सुनि सब चरित भूपगृहँ आए। करि पूजा नृप मुनि बैठाए॥ ४ ॥

अर्थ:

खिलवाड़ी मुनि नारदजी उस नगर में गये और नगरवासियों से उन्होंने सब हाल पूछा। सब समाचार सुनकर वे राजा के महल में आये। राजा ने पूजा करके मुनि को [आसन पर] बैठाया।

दोहा

आनि देखाई नारदहि भूपति राजकुमारि। कहहु नाथ गुन दोष सब एहि के हृदयँ बिचारि॥ १३० ॥

अर्थ:

[फिर] राजा ने राजकुमारी को लाकर नारदजी को दिखलाया [और पूछा कि--] हे नाथ! आप अपने हृदय में विचारकर इस के सब गुण-दोष कहिये।

दोहा 131 के अंतर्गत
चौपाई

देखि रूप मुनि बिरति बिसारी। बड़ी बार लगि रहे निहारी॥ लच्छन तासु बिलोकि भुलाने। हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने॥ १ ॥

अर्थ:

उसके रूप को देखकर मुनि वैराग्य भूल गये और बड़ी देर तक उसकी ओर देखते ही रह गये। उसके लक्षण देखकर मुनि अपने-आप को भी भूल गये और हृदय में हर्षित हुए, पर प्रकट रूप में उन लक्षणों को नहीं कहा।

चौपाई

जो एहि बरइ अमर सोइ होई। समरभूमि तेहि जीत न कोई॥ सेवहिं सकल चराचर ताही। बरइ सीलनिधि कन्या जाही॥ २ ॥

अर्थ:

[लक्षणों को सोचकर वे मन में कहने लगे कि] जो इसे ब्याहेगा, वह अमर हो जायगा और रणभूमि में कोई उसे जीत न सकेगा। यह शीलनिधि की कन्या जिसको वरेगी, सब चर-अचर जीव उसकी सेवा करेंगे।

चौपाई

लच्छन सब बिचारि उर राखे। कछुक बनाइ भूप सन भाषे॥ सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीं। नारद चले सोच मन माहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

सब लक्षणों को विचारकर मुनि ने अपने हृदय में रख लिया और राजा से कुछ अपनी ओर से बनाकर कह दिया। राजा से लड़की के सुलक्षण कहकर नारदजी चल दिये। पर उनके मन में यह चिन्ता थी कि--।

चौपाई

करौं जाइ सोइ जतन बिचारी। जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी॥ जप तप कछु न होइ तेहि काला। हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला॥ ४ ॥

अर्थ:

मैं जाकर सोच-विचारकर अब वही उपाय करूँ, जिससे यह कन्या मुझे ही वरे। इस समय जप-तप से तो कुछ हो नहीं सकता। हे विधाता! मुझे यह कन्या किस तरह मिलेगी?

दोहा

एहि अवसर चाहिअ परम सोभा रूप बिसाल। जो बिलोकि रीझै कुअँरि तब मेलै जयमाल॥ १३१ ॥

अर्थ:

इस समय तो बड़ी भारी शोभा और विशाल (सुन्दर) रूप चाहिए, जिसे देखकर राजकुमारी मुझ पर रीझ जाय और तब जयमाल [मेरे गले में] डाल दे।

दोहा 132 के अंतर्गत
चौपाई

हरि सन मागौं सुंदरताई। होइहि जात गहरु अति भाई॥ मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहि अवसर सहाय सोइ होऊ॥ १ ॥

अर्थ:

[एक काम करूँ कि] भगवान से सुन्दरता माँगूँ; पर भाई! उनके पास जाने में तो बहुत देर हो जाएगी। किन्तु श्रीहरि के समान मेरा हितू भी कोई नहीं है, इसलिये इस समय वे ही मेरे सहायक हों।

चौपाई

बहुबिधि बिनय कीन्हि तेहि काला। प्रगटेउ प्रभु कौतुकी कृपाला॥ प्रभु बिलोकि मुनि नयन जुड़ाने। होइहि काजु हिएँ हरषाने॥ २ ॥

अर्थ:

उस समय नारदजी ने भगवान् की बहुत प्रकार से विनती की। तब लीलामय कृपालु प्रभु [वहीं] प्रकट हो गये। स्वामी को देखकर नारदजी के नेत्र शीतल हो गये और वे मन में बड़े ही हर्षित हुए कि अब तो काम बन ही जाएगा।

चौपाई

अति आरति कहि कथा सुनाई। करहु कृपा करि होहु सहाई॥ आपन रूप देहु प्रभु मोही। आन भाँति नहिं पावौं ओही॥ ३ ॥

अर्थ:

नारदजी ने बहुत आर्त (दीन) होकर सब कथा कह सुनायी [और प्रार्थना की कि] कृपा कीजिये और कृपा करके मेरे सहायक बनिये। हे प्रभो! आप अपना रूप मुझको दीजिये और किसी प्रकार मैं उस (राजकन्या) को नहीं पा सकता।

चौपाई

जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहु सो बेगि दास मैं तोरा॥ निज माया बल देखि बिसाला। हियँ हँसि बोले दीनदयाला॥ ४ ॥

अर्थ:

हे नाथ! जिस तरह मेरा हित हो, आप वही शीघ्र कीजिये। मैं आपका दास हूँ। अपनी माया का विशाल बल देख दीनदयालु भगवान् मन-ही-मन हँसकर बोले--।

दोहा

जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार। सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार॥ १३२ ॥

अर्थ:

हे नारदजी! सुनो, जिस प्रकार आपका परम हित होगा, हम वही करेंगे, दूसरा कुछ नहीं। हमारा वचन असत्य नहीं होता।

दोहा 133 के अंतर्गत
चौपाई

कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी॥ एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ। कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ॥ १ ॥

अर्थ:

हे योगी मुनि! सुनिए, रोग से व्याकुल रोगी कुपथ्य माँगे तो वैद्य उसे नहीं देता। इसी प्रकार मैंने भी तुम्हारा हित करने की ठान ली है। ऐसा कहकर भगवान्‌ अन्तर्धान हो गए।

चौपाई

माया बिबस भए मुनि मूढ़ा। समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा॥ गवने तुरत तहाँ रिषिराई। जहाँ स्वयंबर भूमि बनाई॥ २ ॥

अर्थ:

भगवान्‌ की माया के वशीभूत हुए मुनि ऐसे मूढ़ हो गये कि वे भगवान्‌ की निगूढ़ वाणी को भी न समझ सके। ऋषिराज नारदजी तुरंत वहाँ गये जहाँ स्वयंवर की भूमि बनायी गयी थी।

चौपाई

निज निज आसन बैठे राजा। बहु बनाव करि सहित समाजा॥ मुनि मन हरष रूप अति मोरें। मोहि तजि आनहि बरिहि न भोरें॥ ३ ॥

अर्थ:

राजालोग खूब सज-धजकर समाजसहित अपने-अपने आसन पर बैठे थे। मुनि (नारद) मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे थे कि मेरा रूप बड़ा सुन्दर है, मुझे छोड़ कन्या भूलकर भी दूसरे को न बरेगी।

चौपाई

मुनि हित कारन कृपानिधाना। दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना॥ सो चरित्र लखि काहुँ न पावा। नारद जानि सबहिं सिर नावा॥ ४ ॥

अर्थ:

कृपानिधान भगवान् ने मुनि के कल्याण के लिए उन्हें ऐसा कुरूप बना दिया कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता; पर यह चरित कोई भी न जान सका। सबने उन्हें नारद ही जानकर प्रणाम किया।

दोहा

रहे तहाँ दुइ रुद्र गन ते जानहिं सब भेउ। बिप्रबेष देखत फिरहिं परम कौतुकी तेउ॥ १३३ ॥

अर्थ:

वहाँ दो शिवजी के गण भी थे। वे सब भेद जानते थे और ब्राह्मण के वेष में सारी लीला देखते-फिरते थे। वे भी बड़े मौजी थे।

दोहा 134 के अंतर्गत
चौपाई

जेहिं समाज बैठे मुनि जाई। हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई॥ तहँ बैठे महेस गन दोऊ। बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ॥ १ ॥

अर्थ:

नारदजी अपने हृदय में रूप का बड़ा अभिमान लेकर जिस समाज में जाकर बैठे थे, शिवजी के दोनों गण भी वहीं बैठ गये। ब्राह्मण के वेष में होने के कारण उनकी इस चाल को कोई न जान सका।

चौपाई

करहिं कूटि नारदहि सुनाई। नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई॥ रीझिहि राजकुअँरि छबि देखी। इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी॥ २ ॥

अर्थ:

वे नारदजी को सुना-सुनाकर व्यंग्य वचन कहते थे--भगवान् ने इनको अच्छी 'सुन्दरता' दी है। इनकी शोभा देखकर राजकुमारी रीझ ही जाएगी और 'हरि!' (वानर) जानकर इन्हीं को खास तौर से वरेगी।

चौपाई

मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ। हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ॥ जदपि सुनहिं मुनि अटपटि बानी। समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी॥ ३ ॥

अर्थ:

नारद मुनि को मोह हो रहा था, क्योंकि उनका मन दूसरे के हाथ में था। शिवजी के गण बहुत प्रसन्न होकर हँस रहे थे। यद्यपि मुनि उनकी अटपटी बातें सुन रहे थे, पर बुद्धि भ्रम में सनी हुई होने के कारण वे बातें उनकी समझ में नहीं आती थीं (उनकी बातों को वे अपनी प्रशंसा समझ रहे थे)।

चौपाई

काहुँ न लखा सो चरित बिसेषा। सो सरूप नृपकन्याँ देखा॥ मर्कट बदन भयंकर देही। देखत हृदयँ क्रोध भा तेही॥ ४ ॥

अर्थ:

इस विशेष चरित को और किसी ने नहीं जाना, केवल राजकन्या ने [नारदजी का] वह रूप देखा। उनका बंदर-सा मुँह और भयंकर शरीर देखते ही कन्या के हृदय में क्रोध उत्पन्न हो गया।

दोहा

सखीं संग लै कुअँरि तब चलि जनु राजमराल। देखत फिरइ महीप सब कर सरोज जयमाल॥ १३४ ॥

अर्थ:

तब राजकुमारी सखियों को साथ लेकर इस तरह चली मानो राजहंसिनी चल रही है। वह अपने कमल-जैसे हाथों में जयमाला लिये सब राजाओं को देखती हुई घूमने लगी।

दोहा 135 के अंतर्गत
चौपाई

जेहि दिसि बैठे नारद फूली। सो दिसि तेहिं न बिलोकी भूली॥ पुनि पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं। देखि दसा हर गन मुसुकाहीं॥ १ ॥

अर्थ:

जिस ओर नारदजी [रूप के गर्व में ] फूले बैठे थे, उस ओर उसने भूलकर भी नहीं ताका। नारद मुनि बार-बार उचकते और छटपटाते हैं। उनकी दशा देखकर शिवजी के गण मुसकराते हैं।

चौपाई

धरि नृपतनु तहँ गयउ कृपाला। कुअँरि हरषि मेलेउ जयमाला॥ दुलहिनि लै गे लच्छिनिवासा। नृपसमाज सब भयउ निरासा॥ २ ॥

अर्थ:

कृपालु भगवान्‌ भी राजा का शरीर धारण कर वहाँ जा पहुँचे। राजकुमारी ने हर्षित होकर उनके गले में जयमाला डाल दी। लक्ष्मीनिवास भगवान् दुलहिन को ले गये। सारा नृपसमाज निराश हो गया।

चौपाई

मुनि अति बिकल मोहँ मति नाठी। मनि गिरि गई छूटि जनु गाँठी॥ तब हर गन बोले मुसुकाई। निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई॥ ३ ॥

अर्थ:

मोह के कारण मुनि की बुद्धि नष्ट हो गयी थी, इससे वे [राजकुमारी को देख] बहुत ही विकल हो गये। मानो गाँठ से छूटकर मणि गिर गयी हो। तब शिवजी के गणों ने मुसकराकर कहा-- जाकर दर्पण में अपना मुँह तो देखिये!

चौपाई

अस कहि दोउ भागे भयँ भारी। बदन दीख मुनि बारि निहारी॥ बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा। तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा॥ ४ ॥

अर्थ:

ऐसा कहकर वे दोनों बहुत भयभीत होकर भागे। मुनि ने जल में झाँककर अपना मुँह देखा। अपना रूप देखकर उनका क्रोध बहुत बढ़ गया। उन्होंने शिवजी के उन गणों को अत्यन्त कठोर शाप दिया।

दोहा

होहु निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोउ। हँसेहु हमहि सो लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ॥ १३५ ॥

अर्थ:

तुम दोनों कपटी और पापी जाकर राक्षस हो जाओ। तुमने हमारी हँसी की, उसका फल चखो। अब फिर किसी मुनि की हँसी करना।

दोहा 136 के अंतर्गत
चौपाई

पुनि जल दीख रूप निज पावा। तदपि हृदयँ संतोष न आवा॥ फरकत अधर कोप मन माहीं। सपदि चले कमलापति पाहीं॥ १ ॥

अर्थ:

मुनि ने फिर जल में देखा, तो उन्हें अपना (असली) रूप प्राप्त हो गया; तब भी उन्हें सन्तोष नहीं हुआ। उनके ओंठ फड़क रहे थे और मन में क्रोध था। तुरंत ही वे भगवान् कमलापति के पास चले।

चौपाई

देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई। जगत मोरि उपहास कराई॥ बीचहिं पंथ मिले दनुजारी। संग रमा सोइ राजकुमारी॥ २ ॥

अर्थ:

[मन में सोचते जाते थे--] जाकर या तो शाप दूँगा या प्राण दे दूँगा। उन्होंने जगत् में मेरी हँसी करायी। दैत्यों के शत्रु भगवान् हरि उन्हें बीच रास्ते में ही मिल गये। साथ में लक्ष्मीजी और वही राजकुमारी थीं।

चौपाई

बोले मधुर बचन सुरसाईं। मुनि कहँ चले बिकल की नाईं॥ सुनत बचन उपजा अति क्रोधा। माया बस न रहा मन बोधा॥ ३ ॥

अर्थ:

देवताओं के स्वामी भगवान् ने मीठी वाणी में कहा--हे मुनि! व्याकुल की तरह कहाँ चले? ये शब्द सुनते ही नारद को बड़ा क्रोध आया; माया के वशीभूत होने के कारण मन में चेत नहीं रहा।

चौपाई

पर संपदा सकहु नहिं देखी। तुम्हरें इरिषा कपट बिसेषी॥ मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु। सुरन्ह प्रेरि बिष पान करायहु॥ ४ ॥

अर्थ:

दूसरों की सम्पदा नहीं देख सकते, तुम्हारी ईर्ष्या और कपट बहुत है। समुद्र मथते समय तुमने शिवजी को बावला बना दिया और देवताओं को प्रेरित करके उन्हें विषपान कराया।

दोहा

असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारु। स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहारु॥ १३६ ॥

अर्थ:

असुरों को मदिरा और शिवजी को विष देकर तुमने स्वयं लक्ष्मी और सुन्दर [कौस्तुभ] मणि ले ली। तुम बड़े धोखेबाज और मतलबी हो। सदा कपट का व्यवहार करते हो।

दोहा 137 के अंतर्गत
चौपाई

परम स्वतंत्र न सिर पर कोई। भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई॥ भलेहि मंद मंदेहि भल करहू। बिसमय हरष न हियँ कछु धरहू॥ १ ॥

अर्थ:

तुम परम स्वतन्त्र हो, सिर पर तो कोई है नहीं, इससे जब जो मन को भाता है, [स्वच्छन्दता से ] वही करते हो। भले को बुरा और बुरे को भला कर देते हो। हृदय में हर्ष-विषाद कुछ भी नहीं लाते।

चौपाई

डहकि डहकि परिचेहु सब काहू। अति असंक मन सदा उछाहू॥ करम सुभासुभ तुम्हहि न बाधा। अब लगि तुम्हहि न काहूँ साधा॥ २ ॥

अर्थ:

सबको ठग-ठगकर परखे हो और अत्यन्त निडर हो गये हो; इसीसे [ठगने के काम में ] मन में सदा उत्साह रहता है। शुभ-अशुभ कर्म तुम्हें बाधा नहीं देते। अब तक तुमको किसी ने ठीक नहीं किया था।

चौपाई

भले भवन अब बायन दीन्हा। पावहुगे फल आपन कीन्हा॥ बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा। सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा॥ ३ ॥

अर्थ:

अबकी तुमने अच्छे घर बैना दिया है (मेरे-जैसे जबर्दस्त आदमी से छेड़खानी की है)। अतः अपने किये का फल अवश्य पाओगे। जिस शरीर को धारण करके तुमने मुझे ठगा है, तुम भी वही शरीर धारण करो, यह मेरा शाप है।

चौपाई

कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी॥ मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी। नारि बिरहँ तुम्ह होब दुखारी॥ ४ ॥

अर्थ:

तुमने हमारा रूप बन्दर-सा बना दिया था, इससे बन्दर ही तुम्हारी सहायता करेंगे। [मैं जिस स्त्री को चाहता था, उससे मेरा वियोग कराकर] तुमने मेरा बड़ा अहित किया है, इससे तुम भी स्त्री के वियोग में दुःखी होगे।

दोहा

श्राप सीस धरि हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि। निज माया कै प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि॥ १३७ ॥

अर्थ:

शाप को सिर पर चढ़ाकर, हृदय में हर्षित होते हुए प्रभु ने बहुत विनती की और कृपानिधान भगवान् ने अपनी माया की प्रबलता खींच ली।

दोहा 138 के अंतर्गत
चौपाई

जब हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी॥ तब मुनि अति सभीत हरि चरना। गहे पाहि प्रनतारति हरना॥ १ ॥

अर्थ:

जब भगवान्‌ने अपनी माया को हटा लिया, तब वहाँ न लक्ष्मी ही रह गयीं, न राजकुमारी ही। तब मुनि ने अत्यन्त भयभीत होकर श्रीहरि के चरण पकड़ लिये और कहा--हे शरणागत के दुःखों को हरनेवाले! मेरी रक्षा कीजिये।

चौपाई

मृषा होउ मम श्राप कृपाला। मम इच्छा कह दीनदयाला॥ मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे। कह मुनि पाप मिटिहिं किमि मेरे॥ २ ॥

अर्थ:

हे कृपालु ! मेरा शाप मिथ्या हो जाय। तब दीनों पर दया करने वाले भगवान् ने कहा कि यह सब मेरी ही इच्छा [से हुआ] है। मुनि ने कहा-मैंने आपको अनेक खोटे वचन कहे हैं। मेरे पाप कैसे मिटेंगे ?

चौपाई

जपहु जाइ संकर सत नामा। होइहि हृदयँ तुरत बिश्रामा॥ कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें। असि परतीति तजहु जनि भोरें॥ ३ ॥

अर्थ:

जाकर शंकरजी के शतनाम का जप करो, इससे हृदय में तुरंत शान्ति होगी। शिवजी के समान मुझे कोई प्रिय नहीं है, इस विश्वास को भूलकर भी न छोड़ना।

चौपाई

जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी। सो न पाव मुनि भगति हमारी॥ अस उर धरि महि बिचरहु जाई। अब न तुम्हहि माया निअराई॥ ४ ॥

अर्थ:

हे मुनि! पुरारि (शिवजी) जिस पर कृपा नहीं करते, वह मेरी भक्ति नहीं पाता। हृदय में ऐसा निश्चय करके जाकर पृथ्वी पर विचरो। अब मेरी माया तुम्हारे निकट नहीं आवेगी।

दोहा

बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान। सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान॥ १३८ ॥

अर्थ:

बहुत प्रकार से मुनि को समझा-बुझाकर (ढाढ़स देकर) तब प्रभु अन्तर्धान हो गये और नारदजी श्रीरामचन्द्रजी के गुणों का गान करते हुए सत्यलोक (ब्रह्मलोक) को चले।

दोहा 139 के अंतर्गत
चौपाई

हर गन मुनिहि जात पथ देखी। बिगत मोह मन हरष बिसेषी॥ अति सभीत नारद पहिं आए। गहि पद आरत बचन सुनाए॥ १ ॥

अर्थ:

शिवजी के गणों ने जब मुनि को मोहरहित और मन में बहुत प्रसन्न होकर मार्ग में जाते हुए देखा तब वे अत्यन्त भयभीत होकर नारदजी के पास आये और उनके चरण पकड़कर दीन वचन बोले--।

चौपाई

हर गन हम न बिप्र मुनिराया। बड़ अपराध कीन्ह फल पाया॥ श्राप अनुग्रह करहु कृपाला। बोले नारद दीनदयाला॥ २ ॥

अर्थ:

हे मुनिराज! हम ब्राह्मण नहीं हैं, शिवजी के गण हैं। हमने बड़ा अपराध किया, जिसका फल हमने पा लिया। हे कृपालु ! अब शाप दूर करने की कृपा कीजिये। दीनों पर दया करने वाले नारदजी ने कहा--।

चौपाई

निसिचर जाइ होहु तुम्ह दोऊ। बैभव बिपुल तेज बल होऊ॥ भुज बल बिस्व जितब तुम्ह जहिआ। धरिहहिं बिष्नु मनुज तनु तहिआ॥ ३ ॥

अर्थ:

तुम दोनों जाकर राक्षस होओ; तुम्हें महान् ऐश्वर्य, तेज और बल की प्राप्ति हो। तुम अपनी भुजाओं के बल से जब सारे विश्व को जीत लोगे, तब भगवान् विष्णु मनुष्य का शरीर धारण करेंगे।

चौपाई

समर मरन हरि हाथ तुम्हारा। होइहहु मुकुत न पुनि संसारा॥ चले जुगल मुनि पद सिर नाई। भए निसाचर कालहि पाई॥ ४ ॥

अर्थ:

युद्ध में श्रीहरि के हाथ से तुम्हारी मृत्यु होगी, जिससे तुम मुक्त हो जाओगे और फिर संसार में जन्म नहीं लोगे। वे दोनों मुनि के चरणों में सिर नवाकर चले और समय पाकर राक्षस हुए।

दोहा

एक कलप एहि हेतु प्रभु लीन्ह मनुज अवतार। सुर रंजन सज्जन सुखद हरि भंजन भुबि भार॥ १३९ ॥

अर्थ:

देवताओं को प्रसन्न करने वाले, सज्जनों को सुख देने वाले और पृथ्वी का भार हरण करने वाले भगवान् ने एक कल्प में इसी कारण मनुष्य का अवतार लिया था।

दोहा 140 के अंतर्गत
चौपाई

एहि बिधि जनम करम हरि केरे। सुंदर सुखद बिचित्र घनेरे॥ कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं। चारु चरित नानाबिधि करहीं॥ १ ॥

अर्थ:

इस प्रकार भगवान् के अनेकों सुन्दर, सुखदायक और अलौकिक जन्म और कर्म हैं। प्रत्येक कल्प में जब-जब भगवान् अवतार लेते हैं और नाना प्रकार की सुन्दर लीलाएँ करते हैं।

चौपाई

तब तब कथा मुनीसन्ह गाई। परम पुनीत प्रबंध बनाई॥ बिबिध प्रसंग अनूप बखाने। करहिं न सुनि आचरजु सयाने॥ २ ॥

अर्थ:

तब-तब मुनीश्वरों ने परम पवित्र काव्यरचना करके उनकी कथाओं का गान किया है और भाँति-भाँति के अनुपम प्रसंगों का वर्णन किया है, जिनको सुनकर समझदार (विवेकी) लोग आश्चर्य नहीं करते।

चौपाई

हरि अनंत हरिकथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥ रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीहरि अनन्त हैं (उनका कोई पार नहीं पा सकता) और उनकी कथा भी अनन्त है; सब संत लोग उसे बहुत प्रकार से कहते-सुनते हैं। श्रीरामचन्द्रजी के सुन्दर चरित्र करोड़ कल्पों में भी गाये नहीं जा सकते।

चौपाई

यह प्रसंग मैं कहा भवानी। हरिमायाँ मोहहिं मुनि ग्यानी॥ प्रभु कौतुकी प्रनत हितकारी। सेवत सुलभ सकल दुखहारी॥ ४ ॥

अर्थ:

[शिवजी कहते हैं कि] हे पार्वती! मैंने यह बतलाने के लिये इस प्रसंग को कहा कि ज्ञानी मुनि भी भगवान् की माया से मोहित हो जाते हैं। प्रभु कौतुकी (लीलामय) हैं और शरणागत का हित करनेवाले हैं। वे सेवा करने में बहुत सुलभ और सब दुःखों के हरनेवाले हैं।

सोरठा

सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल। अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि॥ १४० ॥

अर्थ:

देवता, मनुष्य और मुनियों में ऐसा कोई नहीं है जिसे भगवान् की महान् बलवती माया मोहित न कर दे। मन में ऐसा विचार कर उस महामाया के स्वामी (प्रेरक) श्रीभगवान् का भजन करना चाहिये।

दोहा 141 के अंतर्गत
चौपाई

अपर हेतु सुनु सैलकुमारी। कहउँ बिचित्र कथा बिस्तारी॥ जेहि कारन अज अगुन अरूपा। ब्रह्म भयउ कोसलपुर भूपा॥ १ ॥

अर्थ:

हे गिरिराजकुमारी! अब भगवान् के अवतार का वह दूसरा कारण सुनो—मैं उसकी विचित्र कथा विस्तार करके कहता हूँ—जिस कारण से जन्मरहित, निर्गुण और रूपरहित (अव्यक्त सच्चिदानन्दघन) ब्रह्म अयोध्यापुरी के राजा हुए।

चौपाई

जो प्रभु बिपिन फिरत तुम्ह देखा। बंधु समेत धरें मुनिबेषा॥ जासु चरित अवलोकि भवानी। सती सरीर रहिहु बौरानी॥ २ ॥

अर्थ:

जिन प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को तुमने भाई लक्ष्मणजी के साथ मुनियों का-सा वेष धारण किये वन में फिरते देखा था और हे भवानी! जिनके चरित्र देखकर सती के शरीर में तुम बावली हो गयी थीं।

चौपाई

अजहुँ न छाया मिटति तुम्हारी। तासु चरित सुनु भ्रम रुज हारी॥ लीला कीन्हि जो तेहिं अवतारा। सो सब कहिहउँ मति अनुसारा॥ ३ ॥

अर्थ:

अब भी तुम्हारे उस बावलेपन की छाया नहीं मिटती, उन्हीं के भ्रमरूपी रोग के हरण करनेवाले चरित्र सुनो। उस अवतार में भगवान् ने जो-जो लीला की, वह सब मैं अपनी बुद्धि के अनुसार तुम्हें कहूँगा।

चौपाई

भरद्वाज सुनि संकर बानी। सकुचि सप्रेम उमा मुसुकानी॥ लगे बहुरि बरनै बृषकेतू। सो अवतार भयउ जेहि हेतू॥ ४ ॥

अर्थ:

भरद्वाज! शंकरजी के वचन सुनकर पार्वतीजी सकुचाकर प्रेमसहित मुसकरायीं। फिर वृषकेतु शिवजी जिस कारण से भगवान् का वह अवतार हुआ था, उसका वर्णन करने लगे।

दोहा

सो मैं तुम्ह सन कहउँ सबु सुनु मुनीस मन लाइ। राम कथा कलि मल हरनि मंगल करनि सुहाइ॥ १४१ ॥

अर्थ:

हे मुनीश्वर भरद्वाज! मैं वह सब तुमसे कहता हूँ, मन लगाकर सुनो। श्रीरामचन्द्रजी की कथा कलियुग के पापों को हरनेवाली, कल्याण करनेवाली और बड़ी सुन्दर है।