कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी
कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी
चौपाई ४, दोहा १३७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी॥ मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी। नारि बिरहँ तुम्ह होब दुखारी॥ ४ ॥
अर्थ
तुमने हमारा रूप बन्दर-सा बना दिया था, इससे बन्दर ही तुम्हारी सहायता करेंगे। [मैं जिस स्त्री को चाहता था, उससे मेरा वियोग कराकर] तुमने मेरा बड़ा अहित किया है, इससे तुम भी स्त्री के वियोग में दुःखी होगे।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “नारद का शाप और मोहभंग” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १३७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में नारद का स्वयंवर में मोह, शाप और अंततः माया-भंग का वर्णन है।
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नारद का शाप और मोहभंग