मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ
मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ
चौपाई ३, दोहा १३४ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ। हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ॥ जदपि सुनहिं मुनि अटपटि बानी। समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी॥ ३ ॥
अर्थ
नारद मुनि को मोह हो रहा था, क्योंकि उनका मन दूसरे के हाथ में था। शिवजी के गण बहुत प्रसन्न होकर हँस रहे थे। यद्यपि मुनि उनकी अटपटी बातें सुन रहे थे, पर बुद्धि भ्रम में सनी हुई होने के कारण वे बातें उनकी समझ में नहीं आती थीं (उनकी बातों को वे अपनी प्रशंसा समझ रहे थे)।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “नारद का शाप और मोहभंग” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में नारद का स्वयंवर में मोह, शाप और अंततः माया-भंग का वर्णन है।
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नारद का शाप और मोहभंग