सखीं संग लै कुअँरि तब चलि

दोहा १३४ · बालकाण्ड

दोहा पाठ

सखीं संग लै कुअँरि तब चलि जनु राजमराल। देखत फिरइ महीप सब कर सरोज जयमाल॥ १३४ ॥

अर्थ

तब राजकुमारी सखियों को साथ लेकर इस तरह चली मानो राजहंसिनी चल रही है। वह अपने कमल-जैसे हाथों में जयमाला लिये सब राजाओं को देखती हुई घूमने लगी।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “नारद का शाप और मोहभंग” प्रकरण का दोहा १३४ है। इस प्रकरण में नारद का स्वयंवर में मोह, शाप और अंततः माया-भंग का वर्णन है।

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नारद का शाप और मोहभंग