जपहु जाइ संकर सत नामा
जपहु जाइ संकर सत नामा
चौपाई ३, दोहा १३८ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जपहु जाइ संकर सत नामा। होइहि हृदयँ तुरत बिश्रामा॥ कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें। असि परतीति तजहु जनि भोरें॥ ३ ॥
अर्थ
जाकर शंकरजी के शतनाम का जप करो, इससे हृदय में तुरंत शान्ति होगी। शिवजी के समान मुझे कोई प्रिय नहीं है, इस विश्वास को भूलकर भी न छोड़ना।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “नारद का शाप और मोहभंग” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १३८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में नारद का स्वयंवर में मोह, शाप और अंततः माया-भंग का वर्णन है।
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नारद का शाप और मोहभंग