भरद्वाज सुनि संकर बानी
भरद्वाज सुनि संकर बानी
चौपाई ४, दोहा १४१ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
भरद्वाज सुनि संकर बानी। सकुचि सप्रेम उमा मुसुकानी॥ लगे बहुरि बरनै बृषकेतू। सो अवतार भयउ जेहि हेतू॥ ४ ॥
अर्थ
भरद्वाज! शंकरजी के वचन सुनकर पार्वतीजी सकुचाकर प्रेमसहित मुसकरायीं। फिर वृषकेतु शिवजी जिस कारण से भगवान् का वह अवतार हुआ था, उसका वर्णन करने लगे।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “नारद का शाप और मोहभंग” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १४१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में नारद का स्वयंवर में मोह, शाप और अंततः माया-भंग का वर्णन है।
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नारद का शाप और मोहभंग