निज निज आसन बैठे राजा

चौपाई ३, दोहा १३३ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

निज निज आसन बैठे राजा। बहु बनाव करि सहित समाजा॥ मुनि मन हरष रूप अति मोरें। मोहि तजि आनहि बरिहि न भोरें॥ ३ ॥

अर्थ

राजालोग खूब सज-धजकर समाजसहित अपने-अपने आसन पर बैठे थे। मुनि (नारद) मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे थे कि मेरा रूप बड़ा सुन्दर है, मुझे छोड़ कन्या भूलकर भी दूसरे को न बरेगी।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “नारद का शाप और मोहभंग” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १३३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में नारद का स्वयंवर में मोह, शाप और अंततः माया-भंग का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
नारद का शाप और मोहभंग