परम स्वतंत्र न सिर पर कोई
परम स्वतंत्र न सिर पर कोई
चौपाई १, दोहा १३७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
परम स्वतंत्र न सिर पर कोई। भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई॥ भलेहि मंद मंदेहि भल करहू। बिसमय हरष न हियँ कछु धरहू॥ १ ॥
अर्थ
तुम परम स्वतन्त्र हो, सिर पर तो कोई है नहीं, इससे जब जो मन को भाता है, [स्वच्छन्दता से ] वही करते हो। भले को बुरा और बुरे को भला कर देते हो। हृदय में हर्ष-विषाद कुछ भी नहीं लाते।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “नारद का शाप और मोहभंग” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १३७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में नारद का स्वयंवर में मोह, शाप और अंततः माया-भंग का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
नारद का शाप और मोहभंग