मुनि अति बिकल मोहँ मति नाठी
मुनि अति बिकल मोहँ मति नाठी
चौपाई ३, दोहा १३५ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
मुनि अति बिकल मोहँ मति नाठी। मनि गिरि गई छूटि जनु गाँठी॥ तब हर गन बोले मुसुकाई। निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई॥ ३ ॥
अर्थ
मोह के कारण मुनि की बुद्धि नष्ट हो गयी थी, इससे वे [राजकुमारी को देख] बहुत ही विकल हो गये। मानो गाँठ से छूटकर मणि गिर गयी हो। तब शिवजी के गणों ने मुसकराकर कहा-- जाकर दर्पण में अपना मुँह तो देखिये!
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “नारद का शाप और मोहभंग” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १३५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में नारद का स्वयंवर में मोह, शाप और अंततः माया-भंग का वर्णन है।
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नारद का शाप और मोहभंग