जेहि दिसि बैठे नारद फूली

चौपाई १, दोहा १३५ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

जेहि दिसि बैठे नारद फूली। सो दिसि तेहिं न बिलोकी भूली॥ पुनि पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं। देखि दसा हर गन मुसुकाहीं॥ १ ॥

अर्थ

जिस ओर नारदजी [रूप के गर्व में ] फूले बैठे थे, उस ओर उसने भूलकर भी नहीं ताका। नारद मुनि बार-बार उचकते और छटपटाते हैं। उनकी दशा देखकर शिवजी के गण मुसकराते हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “नारद का शाप और मोहभंग” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १३५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में नारद का स्वयंवर में मोह, शाप और अंततः माया-भंग का वर्णन है।

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नारद का शाप और मोहभंग