मृषा होउ मम श्राप कृपाला

चौपाई २, दोहा १३८ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

मृषा होउ मम श्राप कृपाला। मम इच्छा कह दीनदयाला॥ मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे। कह मुनि पाप मिटिहिं किमि मेरे॥ २ ॥

अर्थ

हे कृपालु ! मेरा शाप मिथ्या हो जाय। तब दीनों पर दया करने वाले भगवान् ने कहा कि यह सब मेरी ही इच्छा [से हुआ] है। मुनि ने कहा-मैंने आपको अनेक खोटे वचन कहे हैं। मेरे पाप कैसे मिटेंगे ?

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “नारद का शाप और मोहभंग” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १३८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में नारद का स्वयंवर में मोह, शाप और अंततः माया-भंग का वर्णन है।

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नारद का शाप और मोहभंग