जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा
जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा
चौपाई ४, दोहा १३२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहु सो बेगि दास मैं तोरा॥ निज माया बल देखि बिसाला। हियँ हँसि बोले दीनदयाला॥ ४ ॥
अर्थ
हे नाथ! जिस तरह मेरा हित हो, आप वही शीघ्र कीजिये। मैं आपका दास हूँ। अपनी माया का विशाल बल देख दीनदयालु भगवान् मन-ही-मन हँसकर बोले--।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “नारद का शाप और मोहभंग” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १३२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में नारद का स्वयंवर में मोह, शाप और अंततः माया-भंग का वर्णन है।
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नारद का शाप और मोहभंग