जेहिं समाज बैठे मुनि जाई

चौपाई १, दोहा १३४ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

जेहिं समाज बैठे मुनि जाई। हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई॥ तहँ बैठे महेस गन दोऊ। बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ॥ १ ॥

अर्थ

नारदजी अपने हृदय में रूप का बड़ा अभिमान लेकर जिस समाज में जाकर बैठे थे, शिवजी के दोनों गण भी वहीं बैठ गये। ब्राह्मण के वेष में होने के कारण उनकी इस चाल को कोई न जान सका।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “नारद का शाप और मोहभंग” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में नारद का स्वयंवर में मोह, शाप और अंततः माया-भंग का वर्णन है।

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नारद का शाप और मोहभंग